बच्चों से कैसे बरतें

बच्चों से कैसे बरतें ? बच्चों को किसी उपलब्धि पर पुरस्कृत करना उतना ही गलत है, जितना किसी गलती पर दंडित करना । जो प्रगतिशील सोच के शिक्षक हैं, वे सोचते हैं कि बच्चों को गलती पर हम दंड तो नहीं देंगे, लेकिन किसी उपलब्धि पर पुरस्कार देने में क्या हर्ज है ? इससे तो फायदे ही हैं । बच्चे खुश हो जाते हैं और उत्साह से पढ़ते हैं । उन्हें पता नहीं कि पुरस्कार और दंड एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । एक को आपने चुना तो दूसरा अपने आप चुना चला जायेगा । सिक्के के एक भाग को उठाना चाहेंगे तो दूसरा भाग भी उसी के साथ उठ जायेगा । । अगर बच्चों को आप पुरस्कार का प्रलोभन देते हैं, तो अनजाने ही कभी पुरस्कार न पा सकने का भय भी दे रहे हैं । अनजाने ही एक तनाव का बीजारोपण भी कर रहे हैं । हमारी सारी शिक्षा भय और लोभ की बुनियाद पर खड़ी है । इसका दुष्परिणाम हुआ कि काम गौण हो गया और पुरस्कार प्रधान । पुरस्कार किसी तरह पाया जाना चाहिए । काम के अलावा उसे हथियाने का कोई और तरीका हो तो अपनाया जाना चाहिए । इस तरह सभी क्षेत्रों में पुरस्कार कर्म केंद्रित कम और पैरवी केंद्रित अधिक हो गया । रास्ता क्या है ? शासक लोग अपना काम निकालने के लिए लोभ और भय का सहारा लेते हैं । लेकिन मनुष्य को अगर बनाना हो तो इन दोनों का दामन एक साथ छोड़ देना होगा । काम का आनंद, कोई नयी चीज सीखने और सीख लेने का आनंद ही इतना अधिक है कि उसके लिए किसी पुरस्कार के पच्चल की जरूरत क्या है ! शिक्षक सीखने का रस पैदा करे और बच्चा जब सीख ले तो उसकी खुशी को बढ़ाने के लिए उत्सव मनाए, डांस पार्टी का आयोजन कर दे । बच्चा खुशी से गा उठे । चीखे । खेले-थुपे । तरह-तरह से खुशी का इजहार करे । मस्त हो जाय । ज्ञान हासिल करने का नशा लग जाय । जिन्हें कार्यानंद का नशा लग जायेगा, उन्हें पुरस्करानंद नहीं खींच पायेगा । देश में कार्य- संस्कृति इसी रास्ते से कायम होगी और भ्रष्टाचार स्वयमेव नियंत्रित होगा ।

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